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अद्वैतवाद, अहं ब्रह्मास्मि | ऑनलाइन बुलेटिन

©संतोष यादव

परिचय- मुंगेली, छत्तीसगढ़.


 

अद्वैतवाद के प्रवर्तक आदिगुरु शंकराचार्य है। शंकराचार्य ने ही अपने अद्वैतवाद के सिद्धांत में आत्मा और परमात्मा (ब्रह्मा) के बारे में विस्तार से वर्णन किया है, यहां कुछ प्रमुख सिद्धांतों का वर्णन किया जा रहा है –

 

  • (1) ब्रह्म (आत्मा और परमात्मा)।
  • (2) ब्रह्म के रूप
  • (3) ब्रह्म के अस्तित्व के प्रमाण
  • (4) माया
  • (5) जगत (ब्रम्हांड)
  • (6) मोक्ष
  • (7) मोक्ष प्राप्ति के साधन
  • (8) साधन चतुष्ठय
  • (9) साधना के चरण
  • (10) अद्वैतवाद: अहम् ब्रह्मास्मि : रचना का प्रमुख आधार।

 

(1) ब्रह्म (आत्मा और परमात्मा)-

 

शंकराचार्य ने आत्मा और परमात्मा दोनों को अलग – अलग नहीं माना है। आत्मा और ब्रह्म दो नहीं एक है। क्योंकि दोनों सत् चित् और आनंद है अर्थात् सच्चिदानंद स्वरुप है। दोनों अजर, अमर, अविनाशी, अजन्मा है। परमात्मा ही सभी मनुष्यों, प्राणियों में आत्मा के रूप में वास (निवास) करता है। अर्थात् सारा जगत मिथ्या है एक मात्र सत्य ब्रह्म है। आत्मा ही ब्रह्मा है और ब्रह्मा ही आत्मा है।

 

(2) ब्रह्मा के रूप – ब्रह्मा तो एक ही है, परंतु उसके दो रूप है –

 

(1) निर्गुण रूप –

 

निर्गुण ब्रह्मा को परब्रह्मा कहते हैं, यह अमूर्त, स्थिर, है। आदि गुरु शिवशंकर (अर्धनारीश्वर) या ॐ आकार है यह मूलतः निर्गुण ही है अर्थात् वह गुणों से परे है। ब्रह्मा का साक्षात्कार ही जीवों (आत्मा) का परम लक्ष्य है, ब्रह्मा सर्वोच्च ज्ञान है। ब्रह्मा – ज्ञान से संसार का ज्ञान जो मूलतः अज्ञान है समाप्त हो जाता है।ब्रह्मा अनंत, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है, ब्रह्मा मूल जगत का आधार है। ब्रह्मा ब्रह्मांड का उत्पत्ति और विनाश का कारण है। ब्रह्मा भेदों से परे है, विरोधों से मुक्त है, अनिर्वचनीय है, ज्ञाता- ज्ञेय- ज्ञान से परे है, ब्रह्मा बुद्धि के चारों कोटियों (प्रकार)सत्य, असत्य, उभय, अनुभय से परे है। ब्रह्मा स्वतः सिद्ध तथा अखंडनीय सत्ता है।

 

(2) सगुण ब्रह्मा –

 

सगुण ब्रह्मा को परब्रह्म कहते हैं वह मूर्त, अस्थिर हैं। श्रीहरि विष्णु, ब्रह्मा आदि

 

(3) ब्रह्मा के अस्तित्व का प्रमाण –

 

(1) अनुभूति-

 

ब्रह्मा को अपरोक्ष (अप्रत्यक्ष) अनुभूति के द्वारा जाना जा सकता है। (2) तात्विक प्रमाण – ब्रह्मा से ही जगत की उत्पत्ति हुई है, सृष्टि का आधार ब्रह्मा है, सृष्टि का मूलतत्व ब्रह्मा है।

 

(3) मनोवैज्ञानिक प्रमाण –

 

ब्रह्मा सभी जीवों की आत्मा है, प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा के अस्तित्व का साक्षात्कार और अनुभव करता है। श्रुतिप्रमाण – वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवतगीता में ब्रह्मा के अस्तित्व का वर्णन है, इसलिए ब्रह्मा का अस्तित्व है।

 

(4) माया-

 

माया ब्रह्मा की शक्ति है, माया शक्ति के आधार पर ही ब्रह्मा विश्व का निर्माण करता है। माया का निवास ब्रह्मा में है, ब्रह्मा अनादि है माया भी अनादि है। ब्रह्मा माया से प्रभावित नहीं होता है। माया का अविद्या, अज्ञान, भ्रम आदि कई नाम है। माया और अविद्या एक ही है। माया ईश्वर को और अविद्या जीवों प्रभावित करता है। अविद्या सत्य पर पर्दा डाल देती है, अविद्या ब्रह्मा (आत्मा) को ढक लेती है।

 

(5) जगत (ब्रह्मांड)-

 

ब्रह्मांड पूर्णतः सत्य नहीं है। ब्रह्मा ही एकमात्र सत्य है। जगत की उत्पत्ति और विनाश, रक्षण ब्रह्मा के द्वारा किया जाता है। यह संसार परिवर्तनशील है अतः संसार पूर्णतः सत्य नहीं है। संसार ब्रह्मा की माया है।

 

जगत की सत्ता –

 

  • (1) प्रतिभाषिक सत्ता- स्वप्न अथवा भ्रम अवस्था।

 

  • (2) व्यवहारिक सत्ता- जागृत अवस्था में जगत सत्य प्रतीत होती है। परंतु यह सत्ता पूर्णतः सत्य नहीं है।

 

  • (3) पारमार्थिक सत्ता- पारमार्थिक सत्ता शुद्ध सत्ता है जो कभी भी बाधित नहीं होती है। जगत व्यवहारिक सत्ता है जगत व्यवहारिक दृष्टि से पूर्णतः सत्य है परंतु पारमार्थिक दृष्टिकोण की अपेक्षा कम सत्य है अर्थात् अंशतः सत्य है। क्योंकि पूरा ब्रह्मांड एक दिन ब्रह्मा में विलीन हो जायेगा अतः पूर्णतः सत्य केवल ब्रह्मा ही है।

 

(6) मोक्ष –

 

आत्मा का जन्म – मरण के चक्र से मुक्त होना ही मोक्ष है, मोक्ष आत्मा का सहज स्वरूप है, अविद्या ने इस स्वरूप को अवृत कर (ढंक) रखा है। जब अविद्या (अज्ञानता) दूर हो जाती है तब आत्मा अपने मूल स्वरूप में प्रगट हो जाती है। मोक्ष शाश्वत जीवन है, मोक्ष आत्मा का शुद्ध रूप में ब्रह्मा में निवास है। ब्रह्मा को जानने वाला जीव ब्रह्मा बन जाता है, मोक्ष आत्मा का ब्रह्मा में विलय हो जाना है। आत्मा नित्य मुक्त है मोक्ष आत्मा का पारमार्थिक स्वभाव है। आत्मा नित्य रूप मे ब्रह्मा ही है। मोक्ष परम आनंद की स्थिति है, ब्रह्मा सत् चित् आनंद है और आत्मा उस से अभिन्न है। मोक्ष आनंदयुक्त है, परमानंद है।

 

मोक्ष की अवस्थाएं –

 

(1) जीवन मुक्ति –

 

जीवन मुक्ति की प्राप्ति अहम् ब्रह्मास्मि: (मैं ही ब्रह्मा हूं अर्थात् आत्मा ही ब्रह्मा है)का बोध होते ही प्राप्त हो जाती है। इसमें आत्मा का शरीर से संबंध (मोह) समाप्त हो जाता है।  परंतु पूर्व कर्मों के कारण आत्मा शरीर पर तब तक निवास करता है जब तक कर्मफल पूर्णतः समाप्त न हो जाए।

 

(2) विदेह मुक्ति –

 

मृत्यु के पश्चात आत्मा देह (शरीर) से मुक्त हो जाती है। इसे विदेह मुक्ति कहते हैं। (7) मोक्ष प्राप्ति के साधन – मोक्ष प्राप्ति के तीन साधन या मार्ग है -।

(1) ज्ञानमार्ग या ज्ञानयोग मोक्ष प्राप्ति का मूल (वास्तविक) मार्ग ज्ञानमार्ग है, यह मार्ग भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग दोनों से अतिउत्तम है, क्योंकि ज्ञानयोग के कारण ही आत्मा या व्यक्ति को निष्कामकर्म और अद्वैतभक्ति का ज्ञान होता है, ज्ञानयोग या ब्रह्मयोग के कारण आत्मा स्वयं को ब्रह्मा के रूप में जान पाता है, आत्मा अपने मूल स्वरूप को समझ पाता है अर्थात् प्रत्येक आत्मा का मूल स्वरूप ब्रह्मा ही है।  आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्मा ही आत्मा है दोनों अलग – अलग नहीं एक हैं, अद्वैत है।

 

 (2) कर्ममार्ग या कर्मयोग – कर्मयोग दो प्रकार के होते हैं –

 

(1) सकाम कर्म-

 

फल या परिणाम के इच्छा या आशा से कर्म करते हैं, तब उसे सकाम कर्म कहते हैं, सकाम कर्म से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है।

 

(2) निष्काम कर्म-

 

बिना फल या परिणाम की इच्छा या आशा से जिस कर्म करते हैं उसे निष्काम कर्म कहते हैं, निष्काम कर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है। निष्काम कर्म ही श्रेष्ठ कर्म है।

 

(3) भक्तिमार्ग या भक्तियोग – भक्तिमार्ग भी दो प्रकार के होते हैं –

 

(1) द्वैतभक्ति –

 

यदि आत्मा और ब्रह्मा (परमात्मा) को अलग – अलग मानते हैं तब आत्मा का परमात्मा में विलय नहीं हो पाता अर्थात् मोक्ष नहीं मिल पाता है। क्योंकि आत्मा अपने मूल स्वरूप में स्थापित नहीं हो पाती है, आत्मा में ब्रह्मा का गुण नहीं आ पाता, आत्मा परमात्मा का रूप धारण नहीं कर सकता है।

 

(2) अद्वैतभक्ति –

 

जब आत्मा और ब्रह्मा को दो नहीं एक माना जाता है, तब आत्मा ब्रह्मा के स्वरूप में स्थापित हो जाता है, ब्रह्मांड के सभी प्राणी जड़, चेतन सभी वस्तुओं में वह ब्रह्मा को देख पाता है, और स्वयं (आत्मा )धीरे – धीरे ब्रह्मा के साथ एकीकार हो जाता है, स्वयं ब्रह्मा बन जाता है, अर्थात् ब्रह्मा में विलीन हो जाता है। इस प्रकार अद्वैतभक्ति ही श्रेष्ठ भक्ति है, जिससे मोक्ष मिलता है। ज्ञानयोग, कर्मयोग,भक्तियोग एक दूसरे का परस्पर विरोधी नहीं है बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान योग के कारण व्यक्ति स्वयं को तथा दूसरे जीवों को आत्मा या परमात्मा के रूप में जान जाता है, कर्म योग के कारण व्यक्ति (आत्मा) को पता चलता है कि व्यक्ति (आत्मा) स्वयं कर्ता नहीं है आत्मा कर्ता होते हुए भी अकर्ता है,जबकि परमात्मा (ब्रह्मा) अकर्ता होते हुए भी कर्ता है। सारे कार्य ब्रह्मा करता है, मनुष्य या आत्मा स्वयं कोई कार्य नहीं करता है। भक्तियोग के कारण व्यक्ति (आत्मा) ब्रह्मा का साक्षात्कार करता है। वह स्वयं ब्रह्मा बन जाता है। अतः मोक्ष प्राप्ति के लिए तीनों योग या मार्ग नितांत आवश्यक है।

 

(8) साधन चतुष्ठय –

 

ज्ञानमार्ग पर चलने वाले भक्त या साधकों को साधनचतुष्टय अर्थात् मोक्ष मार्ग पर चलने हेतु चार तैयारियों से युक्त होना चाहिए –

 

(1)नित्यानित्यवास्तुवि वेक –

 

नित्य (सत्य) अनित्य (असत्य) वस्तुओं में भेद करने की योग्यता।

 

(2)इहामूत्रार्थभोगविराग-

 

लौकिक और अलौकिक भोगों से अनासक्ति।

 

(3)शमदमादिसाधनसंपत –

 

शम, दम, श्रद्धा, समाधान, तितिक्षा, उपरति छः साधनों से युक्त होना।

 

(4) मुमुक्षुत्व –

 

मोक्ष हेतु दृढ़ संकल्प से युक्त होना।

 

(9) साधना के चरण –

 

साधना के कई चरण है यह कुछ प्रमुख चरणों का वर्णन किया जा रहा है –

 

(1) श्रवण (सुनना) –

 

वेद, ग्रंथ, उपनिषद, दर्शन, श्रीमद्भागवतगीता, रामायण अर्थात् ब्रह्म की लीला या कार्य का गुरु के माध्यम से श्रवण करना

 

(2) चिंतन (मनन)-

 

श्रवण किए हुए ज्ञान को निरंतर तार्किक चिंतन करना ताकि बौद्धिक अवस्था प्राप्त हो सके।

 

(3) निदिध्यासन –

 

ब्रह्मा और जीव (आत्मा) की एकता का तब तक निरंतर ध्यान करते रहना जब तक एकत्व की निर्विकल्प व अपरोक्ष (अप्रत्यक्ष) अनुभूति न हो जाए।

 

(4) पठन –

 

ब्रह्मा की महिमा का पठन (पढ़ना) करना।

 

(5) लेखन –

 

ब्रह्मा की महिमा के गुणगान में लिखना, या समाज की समस्याओं पर लिखना।

 

(6) वाचन (बोलना) –

 

ब्रह्मा की महिमा का अपने मुख से गुणगान करना अर्थात् दूसरे व्यक्तियों ( आत्माओं) को परमात्मा की शक्ति, कार्य, लीला का वर्णन करना। (10) अद्वैतवाद: अहम् ब्रह्मास्मि: रचना का प्रमुख आधार है।

 

  • (1) अद्वैतवाद – शंकराचार्य द्वारा रचित (मूल आधार)।
  • (2) श्रीमद्भागवतगीता – वेदव्यास द्वारा रचित।
  • (3) शिवमहापुराण
  • (4) अन्य ग्रंथ- वेद, (प्रमुखता सामवेद), वेदांत, उपनिषद, भारतीय दर्शन ( सांख्यदर्शन – कपिलमुनि द्वारा रचित।)

 

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