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द्रौपदी : कल और आज draupadee : kal aur aaj

©डॉ. वृंदा साखरकर, बहामास

परिचय:- गायनॉकॉलॉजिस्ट, जन्म महाराष्ट्र में हुआ, अमरीका में रहते हैं, आपने युनो में 1993 में दलितों पर अत्याचार तथा उत्पीड़न के ख़िलाफ़ पेपर पेश किया था।


 

 

हे द्रौपदी

वो कल था

जब तुम्हारे अस्तित्व को नकारा गया था

तुम्हारे एक शरीर का विभाजन

तो पॉंच हिस्सों में हो गया

पर एक अकेले मन का विभाजन तुम कैसे करती?

 

वो कल था

जब तुम्हारा सम्मान केवल तुम्हारे पतीयों

के सम्मान कि परछाईं था

ज़रूरत आने पर अपने अहं के लिये

कौडीयो के दाम दांव पर लगाया गया था

पत्नीधर्म मान कर स्वीकार तो तुम कर गयी

पर किसी की जंघा पर विराजना तुम कैसे स्वीकारती?

 

वो कल था

जब लज्जा रक्षकों लिये तुम्हारे

पाँचों पती असमर्थ, मारे लज्जा से विकलांग थे

और तुम्हें कान्हा की गुहार लगानी पड़ी

वो चीरहरण का घांव तो तुम सह गयी

पर घांव लगाने वालों को तुम कैसे माफ़ करती?

 

आर्यावर्त की साम्राज्ञी होकर

तुम ये सब सह गयी

अपमान का कडवॉं ज़हर पी गयी

केवल एक नारी होने के कारण

 

और एक आज है

क़िस्मत ने इस बार भी

घॉंव तो तुम्हें बहुत दिये

पर अपनी दृढ़ता एवं तिति़क्षा से

तुमने हर संकट को परास्त किया

बिना किसी भीम या अर्जुन की सहायता से

 

आज भी पुरुषी अहं और समाज

कुछ ज्यादा बदला नहीं है

पर बदली तुम हो

आज सब कुछ चुपचाप सह जाने के बजाय

उसे बदलने की ताक़त तुम पा गयी हो

आज तुम्हे कान्हा की ज़रूरत नहीं है

तुम्हारे कलम की एक फटकार

सारें नियमों ख़ारिज करने की शक्ति रखती है

असहाय अबला तो तुम कल भी नहीं थी और आज भी नहीं हो

 

बस इस बार

अपनी तलवार की पैनी धार को भुला मत

उस धार की अहमियत पर अभी

बहुत सारी द्रौपदियों का अस्तित्व निर्भर है

 

 

डॉ. वृंदा साखरकर

Dr. Vrinda Sakharkar, Bahamas

Introduction:- Gynecologist, born in Maharashtra, lives in America, you presented a paper against atrocities and oppression on Dalits in 1993 in UNo.


 

 

Hey Draupadi
that was yesterday
when your existence was denied
division of your body
So it’s done in five parts
But how do you divide a lonely mind?

 

that was yesterday
When your respect only your husbands
was the shadow of respect
For your ego when needed
the price of the code was at stake
If you accept your wife’s religion then you have done it.
But how would you accept sitting on someone’s thigh?

 

that was yesterday
When your shame guards
The five husbands were incapable, handicapped out of shame.
And you had to plead Kanha
The wound of chirharan so you bore
But how do you forgive those who wound up?

 

being the empress of Aryavarta
you endured it all
drank the bitter poison of humiliation
just being a woman

 

and today is
Luck this time too
gave you a lot
But with your perseverance and perseverance
you overcame every adversity
without any help from Bhima or Arjuna

 

Even today male ego and society
not much has changed
but you have changed
Instead of having to bear everything silently today
you have got the power to change it
you don’t need kanha today
a rebuke of your pen
Has the power to set aside all rules
Helpless abla, you were not there yesterday and you are not even today

 

just this time
don’t forget the sharp edge of your sword
on the importance of that edge right now
The existence of many Draupadis is dependent on …

 

 

 

इबादत मैं कैसे करूँ ibaadat main kaise karoon

 

 

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