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अब यह दहेज फिर क्यों साथ में | ऑनलाइन बुलेटिन

©गुरुदीन वर्मा, जी.आज़ाद

परिचय– गजनपुरा, बारां, राजस्थान


कलेजे का टुकड़ा, तुम्हें दे दिया है।

अब यह दहेज फिर, किस बात में।।

कतरा लहू का, तुम्हें दे दिया है।

अब यह दहेज फिर, क्यों साथ में।।

कलेजे का टुकड़ा—————–।।

 

 

अपने लहू से ,यह सींचा है फूल।

संजोकर अरमान, दिल में बहुत।।

किसी की नजर, नहीं लग जाये ।

पाला है संभालकर, इसको बहुत।।

फूल अपने चमन का, तुम्हें दे दिया है।

अब यह दहेज फिर, किस शान में।।

कलेजे का टुकड़ा—————–।।

 

 

इन्हें दे दो तुम भी, कलेजे का टुकड़ा।

अपने लहू का कतरा, इनकी तरहां।।

तुम भी सौंप दो, अपने अरमान इनको।

चमन का फूल इनको, इनकी तरहां।।

इज्ज़त अपने घर की, तुम्हें दे दी है।

अब यह दहेज फिर, किस सम्मान में।।

कलेजे का टुकड़ा—————–।।

 

 

बहुयें ससुराल में, मार दी जाती है।

दहेज इतना, देने के बाद भी क्यों।।

बनाओ स्वालम्बी, तुम बेटियों को।

तब दहेज पर मौतें, होगी ही क्यों।।

कर दिया कन्यादान, एक पिता ने तुमको।

अब यह दहेज फिर, किस अहसान में।।

कलेजे का टुकड़ा—————–।।

 

दुश्मन सारा शहर लगता है | ऑनलाइन बुलेटिन
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