नौ बरस की गुड़िया | ऑनलाइन बुलेटिन


©जलेश्वरी गेंदले
परिचय– शिक्षिका, पथरिया, मुंगेली, छत्तीसगढ़
नौ बरस की नन्हीं गुड़िया
बन गई समझदारी की गहरी पुड़िया।
दुख -सुख में नारी देती नर के साथ
परहित में नर संग, संग चले वो नारी होत महान ।
मेरी होठों में है मुस्कान
वह माता रमाई की है एहसान।
तब बहुजन उद्धार को
बाबा साहब लिख पाए संविधान।
यूं ही नहीं मिली
तुझे यह गौरव सम्मान।
इसके लिए माता रमाई ने किए
अपने चार -चार बच्चों को कुर्बान।
तू सोचता है पढ़ लिखकर हो गया महान
भूल कर रहा है या बड़े हो नादान।
जानकर न बन अनजान
माता रमाई के संघर्ष है महान।
पल- पल पिया की जुदाई
इसमें भी गरीबी की तंगआई।
कैसे किए होंगे बाबा साहब विदेश में पढ़ाई
गर समझने की शक्ति हो वही समझ पाए
जीवनसंगिनी रामू कब बन गई रमाई।
मेरी कलम के
हर एक अक्षर
हर एक शब्द में है मेरी माता रमाई ।
बाल उम्र से
जीवन के वह हर एक क्षण,
गम खुशी के वो पल।
ऊंच-नीच भेदभाव का जहर
जो हर पल ढाता था कहर
पूरी मानवता के साथ
साथ निभाई
वो थी मेरी माता रमाई ।
माता रमाबाई अंबेडकर जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं सादर जय भीम जय संविधान।
-कोटि कोटि नमन












