Fatehpur land dispute- फतेहपुर में जहां बना है मकबरा, वो जमीन असल में किसकी? EXCLUSIVE: सरकारी दस्तावेजों ने खोला 100 साल पुराना राज
फतेहपुर का मकबरा विवाद क्या है (What is the Fatehpur maqbara dispute?)
Fatehpur land dispute-

Fatehpur land dispute- फतेहपुर का मकबरा विवाद क्या है (What is the Fatehpur maqbara dispute?)
Fatehpur land dispute- मुख्य बिंदु:
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फतेहपुर में मकबरे को मंदिर बताकर पूजा के बाद बढ़ा तनाव, हिंदू और मुस्लिम पक्ष आमने-सामने।
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मुस्लिम पक्ष इसे औरंगजेब के फौजदार का मकबरा, तो हिंदू पक्ष भगवान कृष्ण और शिव का मंदिर बता रहा है।
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EXCLUSIVE: यूपी तक के पास मौजूद सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि जमीन 1928 में एक हिंदू जमींदार परिवार की थी।
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जानिए कैसे एक निजी संपत्ति 2012 के एक अदालती फैसले के बाद ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ और फिर वक्फ संपत्ति बन गई।
Fatehpur land dispute फतेहपुर, यूपी: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक मकबरे को मंदिर बताकर पूजा-अर्चना के बाद से खड़ा हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। हिंदू संगठनों का दावा है कि यह ढांचा असल में भगवान शिव और कृष्ण का प्राचीन मंदिर है, जिसे तोड़कर मकबरा बनाया गया। वहीं, मुस्लिम पक्ष इसे मुगल बादशाह औरंगजेब के फौजदार अब्दुल समद और उसके बेटे का मकबरा बताता है।
Fatehpur land dispute इस दावे-प्रतिदावे के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह जमीन सरकारी कागजों में किसकी है? यूपी तक ने इस विवाद की तह तक जाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत से लेकर आज तक के सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल की, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
100 साल पुराना बंटवारा: किसके हिस्से आई थी जमीन?
Fatehpur land dispute कहानी शुरू होती है ब्रिटिश राज से। साल 1928 में फतेहपुर के दो बड़े जमींदार परिवारों – लाल गिरधारी लाल रस्तोगी और मानसिंह परिवार – के बीच जमींदारी का बंटवारा हुआ। 14 अगस्त 1928 को ब्रिटिश अदालत ने विवादित भूमि (गाटा संख्या- 753), जिसका कुल क्षेत्रफल 1.7650 हेक्टेयर (लगभग 1.90 लाख स्क्वायर फीट) था, मानसिंह परिवार को दे दिया। यानी, दस्तावेजों के अनुसार, इस जमीन के शुरुआती मालिक एक हिंदू जमींदार परिवार था।
फिर बिकी जमीन और बन गए मकान
आजादी के बाद 30 दिसंबर 1970 को मानसिंह परिवार के वंशज ने यह जमीन रामनरेश सिंह नाम के व्यक्ति को बेच दी। रामनरेश सिंह ने इस जमीन पर प्लॉटिंग करके कई लोगों को बेच दिया। 10 जुलाई 2014 की एसडीएम रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि रामनरेश सिंह ने जमीन का एक बड़ा हिस्सा (1.5890 हेक्टेयर) लोगों को बेच दिया था और उस पर मकान भी बन चुके हैं।
कैसे बदला जमीन का मालिक? 2012 का वो फैसला
मामले में सबसे बड़ा मोड़ साल 2012 में आया। मुस्लिम पक्ष की ओर से मोहम्मद अनीस ने 2007 में रामनरेश सिंह के खिलाफ एसडीएम कोर्ट में एक वाद दायर किया। इस पर सुनवाई करते हुए 20 अप्रैल 2012 को एसडीएम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने रामनरेश सिंह का नाम खारिज करते हुए जमीन को ‘मंगी मकबरा राष्ट्रीय संपत्ति, मुतवल्ली मोहम्मद अनीस’ के नाम पर दर्ज कर दिया। यहीं से निजी संपत्ति के सरकारी रिकॉर्ड में बड़ा बदलाव हुआ।
हाईकोर्ट से लेकर वक्फ बोर्ड तक… ऐसे मजबूत हुई दावेदारी
इसके बाद मोहम्मद अनीस ने 2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका डालकर जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया। तब तत्कालीन चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ (जो अब CJI हैं) की बेंच ने जिला प्रशासन को जांच का आदेश दिया। एसडीएम की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि मकबरा केवल 0.0600 हेक्टेयर में बना है, जबकि ज्यादातर जमीन पर मकान बन चुके हैं और कुछ खाली पड़ी है।
साल 2019 में इस संपत्ति को उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में ‘वक्फ नंबर- 1635’ के तौर पर दर्ज करा दिया गया और मोहम्मद अनीस के बेटे अबू हुरैरा को इसका मुतवल्ली बना दिया गया।

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Fatehpur land dispute- Fatehpur land dispute यह पूरी कहानी बताती है कि कैसे एक जमीन, जो कभी एक हिंदू जमींदार की निजी संपत्ति थी, कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरते हुए आज एक वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है और यही मौजूदा विवाद की सबसे बड़ी जड़ है।

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